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Bharangi / भारंगी -Clerodendrum serratum Comparative review

वैज्ञानिक नामClerodendrum serratum कुल नाम – Verbenaceae
Classical Mentions :-

Bhavparkash :- हरितयादि वर्ग
Dhanvantri :- गुडुचयादि वर्ग
Madanpal :- अभयादि वर्ग
Raj :- पिप्पल्यादि वर्ग
Kaideev :- ओष्धि वर्ग
Charak :- पुरीषसंग्रहणीय महाकषाय
Shusrut :- पिप्लयादि गण

bharangi
Comparative review Name :-
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Nameभाव प्रकाशDhanvantriमदनपालराज कैदेव
भार्गी**
भृगुभवा**
पघ्ना***
फञ्जी****
ब्राहमणयष्टिका****
ब्राहमणी*
बभनेटी*
भारङ्गी***
खरशाक**
हञ्जिका*
गर्दभशाक**
अङ्गवल्ली***
ववर्पा*
ब्राहमणयष्टि*
वर्वर*
भृङ्गजा*
यष्टि*
वालाटि*
कासजित्*
सुरुण*
भ्रमरेष्टा*
शक्रमाता**
खरणाक*
शुकमाता*
पदमा*
महागर्दभगन्धिका*
भृगुजा*
भंगुरा*
हंसी*
पालिंदी*
भार्गापर्वणी*
कांसहनी*
गंधपर्वणी*
भञ्जी*

बाह्य – स्वरूप :

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बहुवर्षायु गुल्म, कांड व शाखाएं चौपहल। पत्र – 3-8 इंच तक लंबे, डेढ़ से ढाई इंच तक चौड़े, लगभग अवृंत, रेखाकार, आयताकार, अंडाकार, तीक्ष्ण, दंतुर, चिकने – चिकने कुछ मांसल, आमने सामने या 3-3 पत्तियां प्रति चक्र में। पुष्प – व्यास में 1 इंच या इससे अधिक, नीलाभ हल्के गुलाबी वर्ण के, शाखाओं पर गुच्छे में निकलते है और सुगंधित होते हैं।फल : 1-3 खंडिय, परस्पर संयुक्त और मांसल, पकने पर; ष्जामुनी काले रंग के आगम ग्रीष्म ऋतु में व फल आगम वर्षान्त या शरद ऋतु के आरम्भ में होता है।

Chemical constituents :

Resins, fatty and alkaline substances.

गुण- धर्म :

यह कफ-वात शामक, दीपन पाचन, शोथहर, रक्त शोधक, कफघ्न, श्वासहर व ज्वरघ्न है। यह कास, श्वास, शोषण, व्रण, कृमि, दाह, ज्वर आदि का निवारण करती है।

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Comparative review Gunn :-
Nameभाव प्रकाशDhanvantriमदनपालराज कैदेव
रुक्ष***
कटु,तिक्त,कषाय**
उष्ण*****
लघु**
कफवातशामक***
तिक्त*
वातशामक*
कटु तिक्त**

Habitat :

Bharangi is found in almost all parts of India; specially in Himalayas, Bhopal, Bengal, Bihar etc.

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औषधीय प्रयोग :

  • मस्तक शूल = भारंगी की जड़ को गरम जल में घिसकर, कपाल पर इसका लेप करने से मस्तक शूल समाप्त।
  • नेत्र = इसके पत्तों को तेल में उबालकर लगाने से आंख की पलकों की सूजन मिट जाती है।
  • कर्ण शूल = इसकी जड़ को घिसकर एक बूंद कान में डालने से लाभ होता है।
दमा और खांसी =
  1. भारंगी(Bharangi) मूल त्वक और सोंठ को समान भाग में लेकर, उनका चूर्ण बनाकर, 2 ग्राम चूर्ण गर्म जल के साथ बार-बार लेने से दमा और खांसी में आराम होता है।
  2. इसकी मूल का स्वरस अदरक के स्वरस में 2-2 ग्राम की मात्रा में मिलाकर लेने से श्वास का वेग शान्त होते हैं।
  3. भारंगी(Bharangi) के मूल का कपड़छन चूर्ण 1-2 ग्राम दिन में 4-6 बार शहद के साथ चाटने से हिचकी से छुटकारा मिलता है।
  • गलगण्ड = भारंगी की जड़ को चावल की धोवन के साथ पीसकर लेप करने से गलगण्ड मिटता है।
  • राज्यक्षमा = भारंगी व शुंठी का सम्भाग चूर्ण 2 ग्राम उष्ण जल में घोलकर पिलाने से राज्यक्ष्मा समाप्त होता है।
  • रक्त गुल्म = स्त्रियों के गर्भाशय में होने वाला रक्त गुल्म यदि बहुत बड़ा न हो, तो भारंगी, पीपल, करंज की छाल और देवदारू को सम्भाग मिलाकर चूर्ण कर, इस चूर्ण की 2 ग्राम मात्रा तिल के क्वाथ के साथ दो बार देते रहने से रक्त गुल्म नष्ट होता है।
उदर विष =
  • भारंगी की 5 ग्राम मूल को कूटकर 100 मिली लीटर जल में मिलाकर पिलाने चाहिए तथा शरीर पर इसकी मालिश करनी चाहिए।
  • हिचकी = भारंगी(Bharangi) की जड़ का चूर्ण एक चम्मच मिश्री में मिलाकर सुबह दोपहर तथा शाम को सेवन करना चाहिए।
  • उदर कृमि = 3-5 पत्रो को 400-500 ग्राम जल में उबालकर पिलाने से उदर कृमियो का नाश होता है।
  • अंडकोष वृद्धि = भारंगी की जड़ की छाल जौ के पानी में पीसकर गर्म कर बांधने से अंडकोष की सूजन मिट जाती है।
  • शोथ = शोथ में भारंगी के बीजों का चूर्ण घी में भूनकर खाने से लाभ होता है।
  • विसर्प = भारंगी के पत्र व कोमल डालियों का रस लगाने से लाभ होता है।
  • फुंसी = इसके पत्ते और कोमल डालियों का निचोड़ा हुआ रस, घी में मिलाकर, छत्तेदार फुंसियों पर लगाना चाहिए। जिस ज्वार में फोड़े फुंसी होते है, उस ज्वर में भी यही लेप लगाना चाहिए।
Comparative review Karm :-
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Karmभाव प्रकाशDhanvantriमदनपालराज कैदेव
रुचिजनक***
पाचक***
अग्निदीपक**
गुल्म***
रक्तदोष***
शोथ****
कास*****
श्वास*****
पीनस****
ज्वर*****
यक्षमा**
व्रण*
कृमि*
दाह*

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2 replies on “Bharangi / भारंगी -Clerodendrum serratum Comparative review”

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