Botanical name :- Terminalia chebula
Family : Comberetaceae
Verniculer names :-
हिन्दी :- हरड़, हरे, हड़
उर्दू :- हरड़ (Haejarad)
उड़िया :- कथा (Karedha),हरे धा (Kharida)
असमिया :– हिलिखा (Hilikha)
कोंकणी :-ओरडो (Ordo)
कन्नड़ :- अनिलेकई(Anilaykayi),करक्काई(Karakkai)
गुजराती:- हरीतकी (Haritaki),हिमजा(Himaja)
तमिल :- कडुक्कै (Kadukkai)
तेलुगु :- करक्काय(Karakkaya), हरितकि ( Haritaki)
बंगाली :- होरीतकी(Horitaki), नारा ( Narra)
पंजाबी :- हर (Har), हरीतकी (Haritaki)
मराठी :- हिरड (Hiran), हरीतकी (Haritaki),मलयालम :- दिव्या

Classical Mentions :-
वेद :- अथर्व वेद 5/4/3
भाव प्रकाश :- हरीतक्यादी वर्ग
कैदेव :- औषधि वर्ग
सुडोल :- गुदुच्यादी वर्ग
धनवंतरि :- गुदुच्यादी वर्ग
राज :- आम्रादी वर्ग
मदनपाल :- अभ्यादी वर्ग
चंदू :- विरेचन गण
सुषेण :- मंगलाचरण
Comparitive review names :-
| Name | भाव प्रकाश | Dhanvantri | मदनपाल | राज | कैदेव | चंदु | सुषेण | वेद |
| हरीतकि | * | * | * | * | * | * | ||
| अभया | * | * | * | * | * | * | ||
| पथ्या | * | * | * | * | * | * | ||
| काय स्था | * | * | * | |||||
| पूतना | * | * | * | * | * | |||
| अमृता | * | * | * | * | * | * | ||
| हैमवती | * | * | * | * | ||||
| अव्यथा | * | * | * | * | * | * | ||
| चेतकी | * | * | * | * | ||||
| श्रेयसी | * | * | * | * | ||||
| शिवा | * | * | * | * | * | |||
| वय स्था | * | * | ||||||
| विजया | * | * | * | * | * | * | ||
| जीवंती | * | * | ||||||
| रोहिणी | * | * | * | |||||
| प्रपथ्या | * | * | * | * | ||||
| जया | * | * | * | |||||
| प्रणदा | * | * | * | * | ||||
| नंदिनी | * | * | ||||||
| चेतनिका | * | |||||||
| जीवप्रिय | * | |||||||
| जीवनिका | * | |||||||
| भिषग्वरा | * | |||||||
| जीव्या | * | |||||||
| दैवी | * | |||||||
| प्रथमा | * | |||||||
| अमोघा | * | |||||||
| जीवनीय | * | |||||||
| वृतना | * | |||||||
| शूलप्रिया | * | |||||||
| दुर्गा | * | |||||||
| प्राणदा | * |
हरितकि की उत्पति :-
यह प्रशन अष्विंकुमरो ने दक्ष प्रजापति से पूछा और उन्होंने बताया कि एक बार इन्द्र देव अमृत पान कर रहे थे तब एक बूंद पृथ्वी पर गिरी उसी से 7 प्रकार की हरितकि की उत्पति हुई । ( भाव प्रकाश )
विहंगपति ( गरुड़ राज) एक बार अमृत पान करते समय एक बूंद पृथ्वी पर गिरी उसे हरितकि की उत्पति हुई । ( सुषेण निघंटू)
हरितकि नाम की उत्पति :-
सर्व प्रथम हिमालय पर उत्पन होने के कारण व हरे रंग की होने के कारण इसे हरितकी कहते है। ( धनवंत्री निघंटू)
हठ पूर्वक प्राणियों के सम्पूर्ण रोगों को दूर करती है व शरीर को पाट देती है इसलिए हरितकि कहते है। ( राज निघंटू)
External morphology :-
Overall :– medium sized tree ( 24-30m)
Bark – dark brown coloured with patches
Leaves – simple, nearly opposite,similar to vasa, shinny with 2 glands (ग्रंथि)on backside ( 10-12.5 cm length)
Leave veins – in pairs (6-8)
Flower – bisexual (4mm diameter), yellowish white colour
Fruit – shinny, pear shaped (1.8-3.0 cm), yellowish-brownish colour when ripped, contains divisions (3-5 रेखाएं). Unriped fruit without kernels are known as harad in market.
Unriped fruit is known as choti harad
Riped fruit is known as badi harad.
Each fruit contains 1 seed inside them.
Seed – yellowish coloured, cylinderical shaped, hard, similar like bone.
Flowering season – April – may
Fruitning season – jan to april


हरितकि भेद:-
| विजया | विंध्य पर्वत | लौकी की भांति | सभी रोग |
| रोहिणी | प्रत्येक स्थान | गोल | व्रण |
| पूतना | सिंधु देश | गुटली बड़ी व सूक्ष्म आकर | प्रलेप |
| अमृता | चम्पा देश | मासल ( गुदेदार) | शोधन रोग |
| अभया | चम्पा देश | 5 रेखा युक्त | आंख रोग |
| जीवंती | सौराष्ट्र | सोने के समान रंग वाली | सम्पूर्ण रोग नाशन |
| चेतकी श्वेत | हिमालय | 3 रेखा युक्त 6 अंगुल वायस | चूर्ण के लिए |
| चेतकी कृष्ण | हिमालय | 3 रेखा युक्त 1 अंगुल वायस | चूर्ण के लिए |
श्रेष्ठ हरीतकी :- विजया
चेतकी :- विरेचन आर्थ श्रेष्ठ इसकी छाया में आते ही पशु आदि को भी विरेचन लग जाते है। राजाओं के विरेचन के लिए हाथ में रखकर भी विरेचन होजता है।

श्रेष्ठ हरीतकि :-
जो जल में डूब जाए – श्रेष्ठ
जो जल में बार बार डूबे – श्रेष्ठतर ( राज निघंटू)
जिसके एक फल का भार 1 तोला ( 12 ग्राम) सर्वगुण संपन्न ( कैदेव निघंटू)
तोड़ने पर गुड के समान टूटने वाली।
अप्रशस्त हरीतकि :-
पानी में पड़ी हुई/ कीचड़ में पड़ी हुई ( कैदेव निघंटु)
कीड़ों के द्वारा खाई हुई,अग्नि में जली हुई, फटी हुई।
रस स्थान :-
मींगी – मधुर
रेशे – अम्ल
वृंत – तिक्त
छिलका – कटु
गूटली – कषाय
प्रयोग भेद से :-
चबाकर – अग्नि दीपक
पीसकर – मल शोधन
उबालकर – मल रोकती है
भूनकर – त्रिदोष शामक
अनुपान भेद से :-
सेंधव नमक – कफशमक
शक्कर – पित शामक
घृत – वात शामक
गुड – समस्त रोग नाशक
केसे त्रिदोष नाशक है :-
अम्ल – वात शामक व प्रभाव से वात कारक नहीं है।
मधुर , तिक्त – पित्त शामक
रूक्ष, कषाय – कफ शामक
भोजन भेद से :-
भोजन के साथ – बुद्धि , बल, इन्द्रिय विकसित करती है, त्रिदोष शामक
भोजन के बाद – त्रिदोष रोग शीघ्र नाशक
ऋतु भेद से हरितकि सेवन :-
वर्षा – सेंढव नमक के साथ
शरद – शक्कर
हेमंत – सोठ
शिशिर – पीपल
वसंत – मधु
ग्रीष्म – गुड
Chemical Composition :-
Fruit – tenin, chebulizic, koriolegin,18 amino acids, phosphoric acid,chebulinic acid, galic acid
Seed – yellow coloured oil
Flower – chebulin
Kernel – olic acid, linolic acid
Cultivation :-
Mountains and plains up to height of 1300m from west bengal to assam and every where around the plains.
Comparitive review gunn :-
| Gun | भाव प्रकाश | Dhanvantri | मदनपाल | राज | कैदेव | चंदु | सुषेण | वेद |
| पंच रस | * | * | * | * | * | |||
| रुक्ष | * | * | * | |||||
| लघु | * | * | ||||||
| मधुर विपाक | * | * | * | |||||
| त्रिदोष शामक | * | |||||||
| कफ वात शामक | * | * | ||||||
| उष्ण | * | * | * |
Paryog:-
नेत्र रोग :-
- रात भर पानी में भिगोकर सुबह नेत्रों को धोने से
- मोतियाबिंद – मींगी 3 प्रहर भिगोकर अंजन करना, भोजन से पूर्व 3ग्राम चूर्ण + मुनाका+ मिश्री+ मधु खाना
- नेत्रों से पानी आना – छाल पीसकर लेप
कंठ-रोग :
- गली विद्रधि :- 20-40 मिली हरीतकी क्वाथ में 3 से 12 मिली मधु मिलाकर पीना
वक्ष-रोग :
- कफ-निष्कासनार्थ :- हरड़-चूर्ण को 2-5 ग्राम की मात्रा में नित्य सेवन करना चाहिए।
- कास-श्वास :- हरड़, अडूसा की पत्ती, मुनक्का, छोटी इलायची, इन सबसे बने 10-30 मिली क्वाथ में मधु और चीनी मिलाकर दिन
में तीन बार पीना। - हरड़ और सोंठ को समान भाग लेकर चूर्ण बनाएं, इसे गुनगुने जल के श्वास (सांस फूलना) और कामला (पीलिया) में लाभ होता है।
उदर-रोग :- - पाचन-शक्तिवर्धनार्थ :- 3-6 ग्राम हरीतकी-चूर्ण में बराबर मिश्रीमिलाकर सुबह-शाम भोजन के बाद सेवन।
- छर्दि (उलटी)-2-4 ग्राम हरड़ के चूर्ण को मधु में मिलाकर सेवन विशेष तौर से पित्त प्रधान वमन मेह।
- मंदाग्नि-2 ग्राम हरड़ तथा 1 ग्राम सोंठ को गुड़ अथवा सेंधा नमक के साथ मिलाकर सेवन।
- हरड़ का मुरब्बा मंदाग्नि व आमातिसार मे ।
व्रण :- क्वाथ से धोने से
मूर्च्छा :- हरड़ का क्वाथ घी के साथ
रक्तपित्त :- विरेचन करना हो तो 2-5 ग्राम मधु के साथ
विषम ज्वर :- 3-6 ग्राम मधु के साथ
कफ ज्वर :- 3-6 ग्राम चूर्ण सेवन
शोथ :- 2-5 ग्राम चूर्ण गुड के साथ
अति स्वेद :- पीसकर लेप लगाने से
प्रमेह :- 2-5 ग्राम चूर्ण मधु के साथ सुबह शाम
यकृत प्लीहा रोग :-
कामला:- लौह भस्म, हरड़ ,हल्दी समान मात्रा में मिलाकर 1 ग्राम की मात्रा में मधु के साथ।
गुद रोग :-
अर्श :- हरीतकी की क्वाथ से मस्सो को धोना।
Comparitive review Karm :-
| Karm | भाव प्रकाश | राज | Dhanvantri | मदनपाल | कैदेव | चंदु | सुषेण | वेद |
| लेखन | * | |||||||
| मद्य | * | * | * | * | ||||
| चक्षुष्य | * | * | * | * | ||||
| प्रमेह | * | * | * | * | ||||
| कुष्ठ | * | * | * | * | * | |||
| व्रण | * | * | * | |||||
| वमन | * | * | * | * | ||||
| शोफ | * | * | ||||||
| वातरक्त | * | |||||||
| मूत्र कृच्छ | * | |||||||
| वतानुलोमन | * | |||||||
| हृद्य | * | |||||||
| संतरपर्णजन्य रोग | * | |||||||
| इन्द्रिय शक्ति वर्धक | * | |||||||
| तृष्णा | ||||||||
| श्वास | * | * | * | |||||
| कास | * | * | * | |||||
| अर्श | * | * | * | * | ||||
| शोथ | * | * | * | |||||
| कृमि | * | * | * | |||||
| स्वर भेद | * | * | * | * | ||||
| रसायन | * | * | * | |||||
| बृहंण | * | |||||||
| आयुवर्द्धक | * | |||||||
| विष्म ज्वर | * | * | ||||||
| हिचकी | * | * | * | |||||
| कंडू | * | * | ||||||
| हृदय रोग | * | * | * | |||||
| कामला | * | * | * | |||||
| शूल | * | * | ||||||
| अनाह | * | * | * | |||||
| प्लीहा | * | * | ||||||
| यकृत | * | * | * | |||||
| अश्मरी | * | |||||||
| मूत्राघात | * | * | ||||||
| नेत्र रोग | * | |||||||
| चर्म रोग | * | |||||||
| उदर रोग | * | * | * | |||||
| दीपन | * | * | ||||||
| सतंभता नाशक | * | |||||||
| अतिसार | * | * | ||||||
| पांडु | * | |||||||
| उदर्जत्रुगत रोग | * | * | * | |||||
| प्रसन्नता कारक | * | |||||||
| उदावर्त | * |

19 replies on “Haritaki( हरीतकी ) Terminalia chebula Comparative Review”
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