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Manah Shila (मनःशिला) – Realgar : उपरस वर्ग

नाम:-

ससंस्कृतमनःशिला
हिंदीमैनसिल
englishred arsenic or realgar

Chemical formula:- As2S2 (arsenic disulphide)

काठिन्य- 1.5-2

पर्याय:-

मनःशिला, रोग शिला, शिला, नेपाली, मनोज गुप्ता, मनोज्ञा, मनोद्धा, नागजिद्धिका, ●कुनटी, ●कुलटी, गोला, नागमाता, कल्याणिका और रसनेत्रिका।

प्राप्ति स्थान-

नेपाल, चीन, भारत के कुमाऊँ एवं चित्राल क्षेत्र, स्पेन एवं यूनान में।

Types:-

रसरत्नसमुच्चय कार ने मनःशिला के तीन भेद किए है:

1 श्यामांगी:रक्तवर्ण : श्रेष्ठ

2 कणवीरका : पीतवर्ण :श्रेष्ठतर

3 खण्डाख्य :अति रक्तवर्ण :सर्वश्रेष्ठ

श्यामांगी लक्षण– जो मनःशिला वर्ण में श्याम (काली), लाल या किश्चित् पीतवर्ण एवं भारवाली हो, उसे श्यामांगी कहते है।

★यह श्रेष्ठ होती है।

2 कणवीरका लक्षण :-

जो मनःशिला ताम्र के समान रक्तवर्ण की, चमकदार और पीतवर्ण से रहित हो, उसे कणवीरका कहते है।

★यह श्रेष्ठतर होती

3 खंडाख्या:-

जो मनःशिला अत्यन्त रक्तवर्ण, आसानी से चूर्ण होने वाली और भारवाली हो, उसे खण्डाख्य कहते है।

★यह सर्वश्रेष्ठ होती है।

सत्त्व की मात्रा के अनुसार उत्तरोत्तर श्रेष्ठ होती है।

रसकामधेनु में भी रक्त, पित एवं खण्डाख्य तीन भेद बतलाकर खण्डाख्य से पित्त एवं पित्त से रक्त को श्रेष्ठ कहा है।

आयुर्वेद प्रकाश कार ने भी तीन भेद किए है’:-

(1) श्यामा : हिंगुल सदृश रक्तवर्ण, किश्चित् पीतवर्ण तथा अतितेजस्वी।

(2) कणवीरा : रक्तवर्ण की चूर्ण रूप में, अतिभारी। यह श्रेष्ठ होती

(3) द्विखण्डन : किश्चित् रक्त एवं गौरवर्ण, भारवान्।

ग्राह्य मनःशिला:-

कंकड़ पत्थर रहित, रक्त कमल सदृश वर्ण युक्त, भार में गुरु और चमकदार मनःशिला औषध कार्य हेतु उत्तम होती है।

मनःशिला शोधन का प्रयोजन-

अशुद्ध मनःशिला का सेवन से अश्मरी, मूत्रकृछ , विबन्ध , को उतपन्न करती है। शुद्ध मनःशिला सम्पूर्ण रोगों का नाश करती है।

मनशिला शोधन:-

अगस्त्यपत्रतोयेन भाविता सतवारकम्। সृङ्गवैरसैर्वाऽपि विशुद्धघति मनःशिला।। (र. र. स. 3/96)

(1) अगस्त्य पत्र स्वरस या आईक स्वरस की7 भावना देने पर मनःशिला शुद्ध हो जाती है।

(2) मन:शिला में बिजौरा नींबू स्वरस की सात भावना देने से शुद्ध हो जाती

(3) मनःशिला को चूर्णोदक में तीन दिन रखने से शुद्ध हो जाती है।’

मनःशिला के गुण:-

मनःशिला रस में कटु, तिक्त, गुण में स्निग्ध, गुरु, सम एवं बीर्य में उच्ण होती है यह सभी रसायनों में श्रेष्ठ, लेखन, विषघ्न, वर्ण्य, शोषहर, रक्तविकार, अग्निमांद्य, कण्डू, विकास एवं भूतबाधा नाशक है यह कफवातजन्य रोगनाशक एवं विशेषरूप से कफजव्याधिनाशक है।

मैनसिल मात्रा :-

1/32 से 1/16 रत्ती तक।

विकार शमन उपायः

मनशिला सेवनजन्य कोई विकार उत्पन्न हो जाये तो रोगी को तीन दिन तक मधुमिश्रित गोदुग्ध का सेवन करने और पथ्य का सेवन करते रहने पर वमनादि विकार दूर हो जाते है।

सत्त्वपातनः

मनःशिला में गुड, गुग्गुलु, लौहकिट्ट (मण्ड्स और घी सभी द्रव्यों को मनःशिला से अष्टमांश मिलाकर एकत्र पीसें।

इसके बाद मूषा में रखकर धमन करें तो मनःशिला का सत्त्व संखिया (Arsenic) प्राप्त होता है।’

मन:शिला के प्रमुख योग

(1) श्वासकुठार रस

(2) चन्द्रोदय वर्ती

(3) त्रैलोक्यचिंतामणि रस

(4) क्षयकेशरी रस

(5) समीरपन्नग रस।।

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