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Prameh ( प्रमेह ) : Diabetes


मेदोवह स्रोतस की दुष्टी ही प्रमेह उत्पन करती है।

मेदोवह स्त्रोतस परिचय-मेद धातु का वहन करने वाले स्रोत को मेदोवह स्रोतस कहते हैं।
मेदोवह स्त्रोतस का प्राकृत कर्म– शरीर में स्नेहन, स्वेदन तथा शरीर को दृढ़ता प्रदान करना है।
विकृत कर्म- प्रमेह विकृत होने पर स्थौल्यादि विकारों की उत्पत्ति होती है।

मेदोवह स्रोतो दुष्टी के कारण
  1. व्यायाम करना
  2. दिन में सोना
  3. मेद्यमांस का अतिसेवन
  4. वारुणी मद्य का अति सेवन
मेदोवह स्रोदुष्टि के लक्षण

प्रमेह के पूर्वरूप भी मेदोवह स्रोतोदुष्टि के लक्षण हो सकते हैं।

  1. शरीर से अत्यधिक दुर्गन्ध आना (Foul smell from body)
  2. तृष्णा(Polydipsia)
  3. क्षुधा (Hunger)
  4. दुर्बलता (Weakness)
  5. आयु का क्षय होना (Reduced life span)
  6. मधुर रस उक्त मुख का होना(Sweet taste in mouth)
  7. मुख, तालु तथा कण्ठ का सूखना (Dryness of mouth and throat)
  8. शरीर में मलों की अधिकता (Accumulation of waste products in body)
मेदोवह स्रोतस व्याधियां-
  • प्रमेह(diabetes)
  • मोटापा (obesity)
  • पतलापन (emaciation)

प्रमेह- आठ महागद में से प्रमेह भी एक व्याधि है।

प्रमेह मिथ्या आहार विहार से उत्पन्न विकृत त्रिदोषों के द्वारा होने वाले विशिष्ट लक्षण समूह वाली भयंकर व्याधि है।
व्युत्पत्ति-

प्रमेह- प्र उपसर्गपूर्वक मिहक्षरणे धातु से घञ् प्रत्यय करने पर प्रमेह उत्पन हुआ है।
अर्थ- अधिक मात्रा में विकृतमूत्र का त्याग करना।

पर्याय- बहुमूत्रता, मेह ,मूत्र दोष, प्रमीढा

परिभाषा
प्रमेह= बार-बार और प्राय: गंदले मूत्र का त्याग प्रमेह कहलाता है। प्रमेह रोग यद्यपि विदेशज व्याधि है तथापि दोष बाहुल्य के आधार पर प्रमेह तीन प्रकार का होता है।

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प्रमेह के निदान-

आस्यासुखं स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसाः पयांसि ।
नवापानं गुडवैकृतं च प्रमेह हेतुः कफकृच्च सर्वम् ।।

सुखकारक आसन पर बैठना ,आरामदायक आसन पर अधिकाधिक निद्रा या सुख प्राप्त करना,दही सेवन, ग्राम्य पशु पक्षियों के मांस का अधिक रूप में सेवन करना,दूध का अधिक सेवन,नूतन जल,गुड़ के विकार , हलुआ, मालपुआ, मिष्टा आदि,समस्त कफ वर्धक पदार्थों के सेवन करने से प्रमेह रोग की उत्पत्ति हो सकती है।

प्रमेहों में दोष- सभी प्रमेहों में कफ, पित्त और वात ये तीन दोष होते हैं।

  1. मेद
  2. रक्त
  3. वसा
  4. शुक्र
  5. लसिका
  6. मांस
  7. मज्जा
  8. रस
  9. अम्बु
  10. ओज

इस व्याधि में श्लेष्मा (कफ) की यह विशेषता है कि इसके पिच्छिल गुण की वृद्धि होती है तथा द्रवता आ जाती है।

चक्रपाणि लिखते है कि “बहुद्रवः श्लेष्मा
दोषविशेष इति बहुद्रव एव कफोमेहजनक: नाल्पद्रवः इति’ प्रमेह के दश दूष्य हैं प्रायः शरीर की समस्त धातुओं तथा उपधातु प्रमेह व्याधि में दूषित होती हैं ।

प्रमेह संतर्पण जन्य विकार है इसमें उत्पादक दोष कफ के साथ-साथ दूष्य धातुओं की दुर्बलता न होकर उनके प्रमाण में वृद्धि हो जाती है और यह वृद्धि स्वाभाविक या प्राकृत नहीं होती।वह शरीर पुष्टि कारक न होकर विकार जनक होती है।

प्रमेह की संप्राप्ति

सामान्य संप्राप्ति :-
कफ वर्धक आहार- विहार का सेवन

निदानो का अति सेवन।

वात, पित्त, कफ दोष का प्रकुपित्त होना

त्रिदोष प्रकूपित्त होकर मूत्राशय में जाकर मूत्र को दूषित कर

अपने अपने लक्षणों वाला वातज, पित्तज, कफ़ज प्रमेह उत्पन होते है।

विशिष्ट संप्राप्ति (४) वातज, पित्तज, कफज एवम् सहज प्रमेह की संप्राप्ति:-

वातज प्रमेह :-
वात की वृद्धि हो, कफ व पित्त का क्षय हो

वृद्ध वात धातुओं को दूषित कर देता है ( वसा, ओज, मज्जा, लसिका )

इन्हें दूषित कर मूत्राशय में लाकर

वातज प्रमेह उत्पन होता है।

पित्तज प्रमेह :-
अधिक उष्ण द्रव्यो का सेवन

पित्त वर्धक आहार विहार का सेवन करने से

वृद्ध पित्त मेद, मास, व शरीर के क्लेद को दूषित करके

पित्तज प्रमेह उत्पन

कफज प्रमेह :-
कफ वर्धक आहार का अधिक सेवन

मास, मेद तथा बस्ति में स्थित क्लेद दूषित

कफज़ प्रमेह उत्पन्न

सहज प्रमेह :-
जीव को उत्पन्न करने वाले बीज के दूषित होने पर

प्रमेही माता पिता की संतान में आसध्य रूप से प्रमेह उत्पन होता है।

मधुमेह– मधुर स्वभाव वाला ओज़ वायु की रुक्षता के कारण कषाय रस से मिलकर मूत्राशय में चला जाता है और प्रमेह उत्पन्न करता है। ओज के भी है दो भेद है-
अर्धांजली प्रमाण तथा अष्ट बिंदु परिमाण।अर्धांजल परिमाण वाला ओज सर्वशरीर में व्याप्त तथा अष्ट बिन्दु परिमाण का अधिष्ठान हदय है। अद्धाञ्जलि प्रमाण ओज को ही दृश्य के रूप में ग्रहण करना चाहिए क्योंकि इसके ख़तम होने पर रोगी की मृत्यु हो जाती है।

सम्प्राप्ति घटक :-

दोष- कफ प्रधान त्रिदोष
दुष्य- रस, रक्त, मांस, मेद, मज्जा, शुक्र, धातु, वसा, अम्बु, ओज, लसिका
स्रोतस- मेदोवह, मूत्रवह
स्रोतोदुष्टि- संग तथा अति प्रवृत्ति
अधिष्ठान– बस्ति, सर्वशरीर
उद्भव- आमपक्वाशयोत्थ
अग्नि- धात्वाग्निमांद्य ।
स्वभाव– चिरकारी
साध्यासाध्यता- याप्य(पितज)/असाध्य(वातज)

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प्रमेह के पूर्वरूप:-
  1. अति स्वेद (Excessive perspiration)
  2. शरीर से विस्र गंध आना (Foul odour of body)
  3. शिथिल अंग (Looseness of the body parts)
  4. शय्यासन स्वप्न सुखरतिश्च शिथिल अंग अर्थात् बैठने व सोने की अधिक कामना
  5. घनाङ्गता
  6. नेत्र, कर्ण, जिह्वा, दांतों के बालों की अधिकता
  7. कैश व नाखून की अति वृद्धि
  8. शीतल द्रव्यों की अधिक कामना (Sweet taste of mouth)
  9. शरीर व मूत्र में चीटियों का लगना
  10. आलस्य (Lassitudel
  11. पिपासा (Polydypsia)
  12. शरीर की अति चिक्कणता
  13. सर्वाङ्ग शून्यता
  14. हस्तपाद सुप्तता
  15. अवसाद
  16. केशों का जटिलीभाव
  17. हस्तपाद तथा तल दाह
  18. शरीर में भारीपन
  19. श्वास में कष्टता
  20. तन्द्रा
सामान्य लक्षण:-
  1. प्रचुर मात्रा में तथा प्रभूत मात्रा में मूत्र निर्माण (Polyuria)
  2. आविल मूत्रता (Turbid Urine)
  3. मूत्र का मक्षिकाक्रान्त होना
  4. श्वेत तथा घन मूत्र की प्रवृत्ति
  5. अकस्मात् मूत्र निर्गमन (Bed wetting)
  6. शरीर जाड्यता (Stiffness of the body)

दोषों के अनुसार प्रमेह के भेद और लक्षण:-

कफज प्रमेह के भेद-
  1. उदकमेह (Diabetes Insipidus)- स्वच्छ, अधिक श्वेत, शीतल तथा गन्धरहित जल की तरह मूत्र त्याग।
  2. इक्षुबालिका रसमेह (Anumentary Glysuria)–मधुर, शीत, क कुछ पिच्छिल, आविल तथा इक्षुरस के समान मूत्र त्याग।
  3. सान्द्रमेह(Phosphaturia)-कफ प्रकोप के कारण पात्र में रखा हुआ बासी मूत्र गाढ़ा हो जाता है उसे सान्द्रमेही कहते हैं।
  4. सान्द्रप्रसाद मेह (Phosphaturia) – जब कफ प्रकोप के कारण पात्र में ,रखा बासी मूत्र सान्द्र तथा कुछ निर्मल होता है तब उसे सान्द्र प्रसाद मेह कहते हैं।
  5. शुक्लमेह(Chyluria) – चावल के आटे के वर्ण का बार-बार मूत्र त्याग।
  6. शुक्रमेह (Spermaturia)-शुक्र के समान अथवा शुक्र मिले हुए मूत्र का बार-बार त्याग।
  7. शीतमेह (Renal Glycosuria) – अत्यंत मधुर एवं शीतल मूत्र का बार-बार त्याग।
  8. सिकतामेह (Crystalluria)-मूत्रगत दोषों का बालू के छोटे-छोटे कणों के रूप में मूत्र मार्ग से निकलना।
  9. शनैमेह(Frequency)-मन्द, वेगरहित, कठिनता से मूत्र त्याग।
  10. आलालमेह (Albuminuria)- तन्तुवत्बंधे हुए तार से युक्त पिच्छिल मूत्र त्याग
पितज प्रमेह के लक्षण—
  1. क्षारमेह(Alkaline Urine)-गन्ध, वर्ण, रूप तथा स्पर्श में क्षार के समान मूत्र त्याग।
  2. काल मेह- कृष्ण और उष्ण मूत्र काल त्याग।
  3. नीलमेह -चाष पक्षी (नीलकंठ) के पंख के जैसा वर्ण वाला अम्ल मूत्र त्याग
  4. रक्त मेह/लोहित मेह- आम गंधी लवण और उष्ण तथा रक्तवर्णी मूत्र त्याग।
  5. मंजिष्ठा मेह- मंजिष्ठा के क्वाथ के वर्ण के समान मूत्र त्याग।
  6. हारिद्रा मेह- हारिद्र वर्ण का मूत्र त्याग।
वातज प्रमेह के लक्षण:-
  1. वसामेह – वसा मिला हुआ या वसा के समान मूत्र त्याग।
  2. मज्जामेह- मज्जायुक्त मूत्र का निकलना।
  3. हस्तिमेह (Polyuria with Incontinence)- मतवाले हाथी के समान अधिक मात्रा तथा बार-बार मूत्र त्याग।
  4. मधुमेह/क्षौद्र मेह (Diabetic Glycosuria)-कषाय, मधुर, पाण्डु एवं रूक्ष मूत्र का त्याग।
साध्य असाध्यता

समक्रिय’ होने से कफज प्रमेह साध्य होते हैं अर्थात् समान गुण वाले के आश्रय होने से, कफ की प्रधानता से तथा दोष की समान चिकित्सा से दसों कफज प्रमेह साध्य होते हैं।

विषम क्रिय’ होने से पित्तज प्रमेह याप्य होते हैं दोष व दृष्य में से एक की चिकित्सा दूसरे से विरूद्ध होती है।

दोष व दूष्य की चिकित्सा विरुद्ध होने से वातज प्रमेह असाध्य होते हैं।

सहज व कुलज प्रमेह असाध्य होते हैं।
उपद्रवों से युक्त प्रमेह असाध्य होता है।

उपद्रव :-
  • तृष्णा (Polydipsia)
  • अतिसार (Diarrhoea)
  • दाह (Burning sensation)
  • दुर्बलता (Generalised weakness)
  • अरोचक (Anorexia)
  • अविपाक (Indigestion)
  • पुतियुक्त पिडिकाएँ (अलजी, विनता, विद्रधि, शराविका, कच्छपिका,जालिनी, सर्षपी)।
प्रमेह रोग के अन्य भेद :-

आचार्य सुश्रुत के अनुसार
१.सहज प्रमेह (Hereditory diabetes)
२ अपथ्य निमित्तज प्रमेह (Acquired diabetes)

आचार्य चरक मतानुसार
१.स्थूल प्रमेही (Obese diabetic)
२.कृशप्रमेही (Lean diabetic)

आचार्य वाग्भट मतानुसार
१. धातुक्षय जन्यप्रमेह
२. दोषावृत जन्य प्रमेह

प्रमेह में पिड़काओं की उत्पति – इनका कारण जीवाणु संक्रमण है तथा बिना प्रमेह के भी इनमे जीवाणु संक्रमण (Bacterial infection) सम्भव है अत: पिडिकाए प्रमेह के बिना भी हो सकती है। इसीलिए चरक स्पष्ट लिखते हैं कि जिन मनुष्यों का मेद अत्यन्त दूषित हो गया है उनमें ये बिना प्रमेह के भी उत्पन्न हो सकती है, लेकिन इन पिड़काओं का ज्ञान तब तक नहीं होता जब तक कि ये अपने स्थान को पूर्ण रुप में नहीं पकड़ लेती हैं अर्थात् पीड़काओं का पूर्ण स्वरुप प्रकट नहीं होने से ये असाध्य होती हैं।

प्रमेह पिड़काओं की साध्यासाध्यता- कृश मनुष्य के गुदा, हृदय, शिर तथा मर्मस्थान में उत्पन्न एवं उपद्रव से युक्त पिड़कायें असाध्य होती हैं।

प्रमेह पिड़काओं के उपद्रव- अत्यधिक तृष्णा, श्वास, मांस कोथ, मोह, हिक्का, ज्वर, विसर्प और मर्म में अवरोध या रुकावट का होना ये प्रमेह पिड़काओं के
उपद्रव है।

By Bhawna Tourani

Belonging to Ajmer, Rajasthan. Currently persuading B.A.M.S. 3rd Prof. From Gaur Brahman Ayurvedic College. My Strong point is in Ayurvedic Portion so will help you in that. While Studying Ayurveda for last 2 years i developed hobby about learning about Ayurvedic medicines, also good at reading.

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